कुंभ_स्नान_महत्त्व
।।कुंभ_स्नान_महत्त्व।। वेद भगवान् कहते हैं कि - 'हे सन्तगण ! पूर्ण कुम्भ समय पर (बारह वर्ष के बाद ) आया करता है जिसे हम अनेकों बार प्रयागादि तीर्थों में देखा करते हैं। कुम्भ उस समय को कहते हैं जो महान् आकाश में ग्रह-राशि आदि के योग से होता है।' "पूर्णः कुम्भोऽथिकाल अहितस्तं वै पश्यामो बहुधा तु सन्तः । स इमा विश्वा भुवनानि कालं तमाहुः परमे व्योमन् ।। (अथर्ववेद, १६/५३।३) और भी कहा है - हे मनुष्यो ! मैं तुम्हें ऐहिक तथा आ ष्मिक सुखों को देनेवाले चार कुम्भ-पों का निर्माण कर च स्थानों (हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक) में प्रदान करता हूँ।' (क) 'चतुरः कुम्भांश्चतुर्धा ददामि ।' अथर्व० ४।३४।७ कुम्भ पर्व का आरम्भ तब से है जब समुद्र मंथन से अमृत कलश निकला तो देवता उसको लेकर दौड़ पड़े, उनके पीछे-पीछे असुर दौड़ने लगे। तब उस छीना-झपटी में वह कलश पृथ्वी पर चार जगह रखा गया। उससे अमृत की बूंदें गिर गई - विवादे काश्यपेयानां यत्र यत्रावनिस्थले । कलशो न्यपतत्तत्र कुम्भपर्व तदोच्यते ॥ १७ ॥ देवताओं के बारह दिन यह छीना-झपटी चली तो पृथ्वी पर बारह वर्ष बीत गए। इन बारह वर्षों में ब...