कुम्भ महापर्व-प्रयागराज
।। कुम्भ महापर्व-प्रयागराज ।। अन्तः शून्यो बहिः शून्यः, शून्यः कुम्भ इवाम्बरे। अन्तः पूर्णो बहिः पूर्णः पूर्ण कुम्भ इवार्णवे ।। अर्थात् जिस प्रकार एक खाली कुम्भ आकाश में हो तो उसके भीतर तथा बाहर सर्वत्र आकाश ही रहता है तथा जल से पूर्ण कुम्भ समुद्र में डूबा हो तो उसके भीतर और बाहर सर्वत्र जल ही रहता है, उसी प्रकार इस जगत में सर्वत्र तथा इसके बाहर भी सर्वश्रेष्ठ आत्मा ही है। स्पष्ट है कि कुम्भ पर्व आत्मा, आत्मज्ञान जैसी सर्वश्रेष्ठ की प्राप्ति से जुड़ा हुआ है। अवश्मेध सहस्राणि वाजपेय शतानि च। लक्ष प्रदक्षिणा भूमेः कुम्भ स्नानेन तत्फलम् ।। अर्थात् सहस्रों अश्वमेध यज्ञ करने से, सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करने से और लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो फल प्राप्त होता है, वह पुण्य फल केवल कुम्भ स्नान करने से प्राप्त हो जाता है। दर्शनात् स्पर्शनात् पानात् तथा गंगेति कीर्तनात्। स्मरणादेव गंगायाः सद्यः पापात् प्रमुच्यते ।। अर्थात् माँ गंगा के दर्शन, स्पर्श, पान (पीने से), गंगा नाम के कीर्तन से तथा गंगाजी के स्मरण मात्र से ही सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिल जाती है। मकरे च ...