कुंभ_स्नान_महत्त्व
।।कुंभ_स्नान_महत्त्व।।
वेद भगवान् कहते हैं कि -
'हे सन्तगण ! पूर्ण कुम्भ समय पर (बारह वर्ष के बाद ) आया करता है जिसे हम अनेकों बार प्रयागादि तीर्थों में देखा करते हैं। कुम्भ उस समय को कहते हैं जो महान् आकाश में ग्रह-राशि आदि के योग से होता है।'
"पूर्णः कुम्भोऽथिकाल अहितस्तं वै पश्यामो बहुधा तु सन्तः । स इमा विश्वा भुवनानि कालं तमाहुः परमे व्योमन् ।।
(अथर्ववेद, १६/५३।३)
और भी कहा है -
हे मनुष्यो ! मैं तुम्हें ऐहिक तथा आ ष्मिक सुखों को देनेवाले चार कुम्भ-पों का निर्माण कर च स्थानों (हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक) में प्रदान करता हूँ।'
(क) 'चतुरः कुम्भांश्चतुर्धा ददामि ।'
अथर्व० ४।३४।७
कुम्भ पर्व का आरम्भ तब से है जब समुद्र मंथन से अमृत कलश निकला तो देवता उसको लेकर दौड़ पड़े, उनके पीछे-पीछे असुर दौड़ने लगे।
तब उस छीना-झपटी में वह कलश पृथ्वी पर चार जगह रखा गया। उससे अमृत की बूंदें गिर गई -
विवादे काश्यपेयानां यत्र यत्रावनिस्थले ।
कलशो न्यपतत्तत्र कुम्भपर्व तदोच्यते ॥ १७ ॥
देवताओं के बारह दिन यह छीना-झपटी चली तो पृथ्वी पर बारह वर्ष बीत गए। इन बारह वर्षों में बारह बार कलश को उतारा गया तो बारह कुंभ स्थल हुए। इनमें से चार स्थल पृथ्वी पर और आठ स्थल अंतरिक्षादि स्थलों पर हैं जहां कुंभ स्नान का आयोजन किया जाता है-
देवानां द्वादशाहोभिर्मत्यैर्द्वादशवत्सरैः ।
जायन्ते कुम्भपर्वाणि तथा द्वादश संख्यया ॥ २१ ॥
पृथ्वी पर आयोजित होने वाले चारों कुंभों में तो देवता और मनुष्य दोनों आते हैं लेकिन अंतरिक्ष आदि में आयोजित होने वाले कुम्भों में देवता ही पहुंच सकते हैं, मनुष्य की सामर्थ्य वहां पहुंचने की नहीं है --
तत्राघनुत्तये नृणां चत्वारो भुवि भारते ।
अष्टौ लोकान्तरे प्रोक्ता देवैर्गम्या न चेतरैः ॥ २२ ॥
जो व्यक्ति इन कुंभों में स्नान करता है तो देवता भी उस पावनात्मा को नमस्कार करते हैं --
तान्येति यः पुमान् योगे सोऽमृतत्वाय कल्पते ।
देवा नमन्ति तत्रस्थान् यथा रङ्का धनाधिपान् ॥२३॥
पृथिव्यां कुम्भयोगस्य चतुर्धा भेद उच्यते ।
विष्णुद्वारे तीर्थराजेऽवन्त्यां गोदावरीतटे ।।
सुधाविन्दुविनिक्षेपात् कुम्भपर्वेति विश्रुतम् ॥ २४ ॥
स्कन्द पुराण
कुम्भ-पर्व के चार तीर्थस्थान--
कुम्भ का पर्व हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक इन चार तीर्थस्थानों में मनाया जाता है। ये चारों ही एक से एक बढ़कर परम पवित्र तीर्थ हैं। इन चारों तीर्थों में प्रत्येक बारह वर्ष के बाद कुम्भ-पर्व होता है। लिखा भी है-
गङ्गाद्वारे प्रयागे च धारा-गोदावरीतटे ।
कुम्भाख्येयस्तु योगोऽयं प्रोच्यते शङ्करादिभिः ॥
'गङ्गाद्वार (हरिद्वार), प्रयाग, धारानगरी (उज्जैन) और गोदावरी (नासिक) मैं शङ्करादि देवगण ने 'कुम्भयोग' कहा है।'
अबकी बार तीर्थराज प्रयाग में पावन कुंभ का आयोजन हो रहा है । तीर्थराज प्रयाग का बहुत महत्त्व शास्त्र में लिखा है-
कार्तिक महीने में एक हजार बार गङ्गा में स्नान करने से, माघ में सौ बार गङ्गा में स्नान करने से और वैशाख में करोड़ बार नर्मदा में स्नान करने से जो फल होता है वह प्रयाग में कुम्भ पर्व पर सिर्फ एक ही बार स्नान करने से प्राप्त होता है -
सहस्रं कार्तिके स्नानं माघे स्नानशतानि च ।
वैशाखे नर्मदा कोटिः कुम्भस्नानेन तत्फलम् ।। (स्कन्दपुराण)
विष्णुपुराण में भी लिखा है-
हजार अश्वमेध यज्ञ करने से, सौ वाजपेय यज्ञ करने से और लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो फल प्राप्त होता है वह फल केवल प्रयाग के कुम्भ के स्नान से प्राप्त होता है -
अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च ।
लक्षं प्रदक्षिणा भूमेः कुम्भस्नानेन तत्फलम् ।।
मेषराशिंगते जीवे मकरे चन्द्रभास्करौ ।
अमावास्था तदा योगः कुम्भाख्यस्तीर्थनायके ।॥
(स्क० पु०)
#विशेष -
कुंभ में ग्रहों की विशेष स्थिति से ही अमृत का स्रोत निकलता है -
'जिस समय बृहस्पति मेष/वृष राशि पर स्थित हो तथा चन्द्रमा और सूर्य मकर राशि पर हो तो उस समय तीर्थराज प्रयाग में कुम्भ-योग होता है।'
मकरे च दिवानाथे ह्यजगे च बृहस्पतौ ।
कुम्भयोगो भवेत्तत्र प्रयागे ह्यतिदुर्लभः ।।
वृषराशिगते जीवे मकरे चन्द्रभास्करौ।
अमावस्यां तदा योगः कुम्भाख्य तीर्थनायकी ।।
मकरे च दिवानाथे वृषराशिगते गुरौ।
प्रयागे कुम्भयोगो वै माघमासे विधुक्षये ।।
क्यों कि सूर्य चन्द्र और बृहस्पति को कुंभ की सुरक्षा के लिए नियुक्त किया गया था। उन देव ग्रहों की विशेष ज्योतिषीय स्थिति में ही कुंभ के स्थानों अमृत का झरना तत्तद् तीर्थों में बहता है।
इस बार कुंभ तीर्थों के राजा प्रयागराज में हो रहा है। प्रयाग में तो वैसे भी माघ मास में कल्पवास होता है जो परम पावन है। वहां साधु सम्पूर्ण माघ मास में रहकर स्नानादि करते हुए उपासना करते हैं। अबकी बार कुंभ का संयोग होने से तो और भी महत्व बढ़ गया है।
अथ प्रयागमाहात्म्यम् --
संक्षेपेण प्रवक्ष्यामि महिमानं प्रयागजम् ।
षष्टिर्गणसहस्राणि तत्र रक्षन्ति जाह्ववीम् ॥१॥
मार्कण्डेय ऋपि युधिष्ठिर जी से बोले हे राजन् ! संक्षेप में
प्रयागराज का माहात्म्य वर्णन करता हूँ। तीर्थराज (प्रयाग) में श्री गंगाजी की प्रतिदिन साठ (६००००) हजार गण रक्षा करते हैं।
यमुनां रक्षति सदा सविता सत्यवाहनः ।
प्रयागं तु विशेषेण स्वयं रक्षेत्प्रजापतिः ॥२॥
सत्यवाहन (सूर्यनारायण भगवान् प्रतिदिन श्री यमुनाजी की रक्षा करते हैं और प्रयाग की तो विशेष रूप से स्वयं प्रजापति (ब्रह्मा) जी रक्षा करते हैं।
मण्डलं रक्षति हरिदैवतैः परिवारितः ।
तं वटं रक्षति शिवः शूलपाणिर्महेश्वरः ।।३।।
सम्पूर्ण देवताओं के सहित विष्णु भगवान् नरों के मण्डल की रक्षा करते हैं और शूलपाणि श्री महादेवजी उस अक्षय वट- वृक्ष की रक्षा करते हैं।
स्थानं रक्षन्ति वै देवाः सर्वपापहरं शुभम् ।
अधर्मेणावृता लोका नैव गच्छन्ति तत्पदम् ।।४।।
सम्पूर्ण पापों को नाश करने वाले उस स्थान की देवता लोग रक्षा करते हैं, किन्तु अधर्मी लोग उस उत्तम स्थान को कभी प्राप्त नहीं कर सकते ।
अल्पमल्पतरं पापं यदा तस्य नराधिप ।
प्रयागं स्मरमाणस्य सर्वमायाति संक्षयम् ॥५॥
हे राजन् ! अल्प से अल्पतर भी पाप केवल प्रयागराज के स्मरण से ही सम्पूर्ण नष्ट हो जाते हैं।
दर्शनात्तस्य तीर्थस्य नाम संकीर्तनादपि ।
मृत्तिका लभनाद्वापि नरः पापात्प्रमुच्यते ॥६॥
प्रयागराज के दर्शन तथा नाम-कीर्तन से और वहाँ की मृत्तिका लेपन करने से मनुष्य तत्काल ही सर्वप्रकार के पापों से छूट जाता है।
पञ्च कुण्डानि राजेन्द्र येषां मध्ये तु जाह्नवी ।
प्रयागदर्शनादेव पापं नश्यति तत् क्षणात् ॥७।।
हे राजन् ! जिन पांच कुण्डों के बीच में श्री गंगाजी बहती हैं सो वहाँ प्रयागराज का दर्शन करने से नर तत्काल ही सञ्चित पापों से मुक्त हो जाता है।
योजनानां सहस्त्रेषु यो गंगां स्मरते नरः ।
अपि दुष्कृतकर्मासौ लभते परमं पदम् ॥८॥
हजारों कोश दूर होनेपर भी जो गङ्गाजी का स्मरण करता है वह चाहे कितना भी पापी क्यों न हो अवश्य ही परम उत्तम पदको प्राप्त होता है।
ब्रह्मचारी वसेन्मासं पितृदेवांश्च तर्पयेत् ।
गंगा-यमुनयोश्चैव संगमे स्नानमाचरेत् ॥६॥
ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता हुआ जो प्राणी एक मास अर्थात् माघ महीने में कल्पवास करता है और पितरों का तथा देवताओं का तर्पण करता है एवं प्रतिदिन गङ्गा-यमुना के सङ्गम में विधिपूर्वक स्नान करता है वह परम कल्याण को प्राप्त होता है।
प्राप्यते मानवैः पुण्यं प्रयागे तु युधिष्ठिर ।
देव-दानव-गन्धर्वा ऋपयः सिद्धचारणाः ॥१०॥
हे युधिष्ठिर ! प्रयागराज में स्नान करने से मनुष्य अत्यन्त उत्तम पुण्य का भागी होता है अतएव देव, दानव, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध और चारण आदि सभी प्रयागराज की विशेष इच्छा रखते हैं।
तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र स्वर्गलोकमुपाश्नुते ।
अपि दुष्कृतकर्माणो ये नरा दुःखभागिनः ।॥११॥
हे राजेन्द्र ! कितना भी दुराचारी आदमी क्यों न हो वह भी प्रयागराज में स्नान करने से स्वर्गलोक को प्राप्त होता है।
क्षेत्रदर्शनमात्रेण जायन्ते सुखिनो नराः ।
पृथिव्यामटमाना ये लभन्ते शर्मणः क्वचित् ।।१२।।
पृथ्वी में इधर उधर विचरता हुआ जो आदमी कहीं पर भी शान्ति को प्राप्त नहीं होता वह केवल प्रयाग क्षेत्र में गंगा-यमुना के संगम देखने से ही परम शान्ति को प्राप्त होता है।
वेणीदर्शनमात्रेण जायन्ते सुखिनो नराः ।
भूतप्र तपिशाचा वा वेणीपानीय विन्दुभिः ।।१३।।
त्रिवेणी के दर्शन तथा स्नान से मनुष्य अलभ्य सुख को प्राप्त होता है और भूत, प्रेत, पिशाच तथा वेताल योनियों में विचरने वाले प्राणी त्रिवेणी के केवल जल-बिन्दु के स्पर्शमात्र से स्वर्गगामी होते हैं।
स्पृष्टमात्रा विमुच्यन्ते दिव्यदेहधरा नृप ।
स्वर्गलोकं प्रयान्त्येव निष्पापाः शुद्धमानसाः ॥१४॥
और वे दिव्य शरीर को धारण कर हे राजन् सञ्चित पापों से छूटकर परम पद को प्राप्त होते हैं।'
Teerthrajprayagasya mahatmya kathyishyati.
श्रुनुयतस्ततं भत्तत्या वैंचितं फलमाप्नुयत्.
हे राजन् ! तीर्थराज प्रयाग के माहात्म्य को जो भक्ति से सर्वदा कहेंगे अथवा सुनेंगे वे प्राणी अपने वाञ्छित फल को प्राप्त करेंगे।
इति मत्स्यपुराणोक्त प्रयागमाहात्म्यं समाप्तम् ।
विशेष --
कुम्भ पर्व में स्नान करने के पूर्व कलश (कुम्भ) मुद्रा दिखला कर और उसमें अमृत की भावना करके ही स्नान करना चाहिये ।
अतः सभी धर्मावलंबी प्रयाग कुंभ में पधारें।
हमारा वहां ११-१४ जनवरी तक प्रवास रहेगा।
कृष्ण चन्द्र शास्त्री
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र
२६.१२.२४
।।#कुंभ_स्नान_महत्त्व।।
वेद भगवान् कहते हैं कि -
'हे सन्तगण ! पूर्ण कुम्भ समय पर (बारह वर्ष के बाद ) आया करता है जिसे हम अनेकों बार प्रयागादि तीर्थों में देखा करते हैं। कुम्भ उस समय को कहते हैं जो महान् आकाश में ग्रह-राशि आदि के योग से होता है।'
"पूर्णः कुम्भोऽथिकाल अहितस्तं वै पश्यामो बहुधा तु सन्तः । स इमा विश्वा भुवनानि कालं तमाहुः परमे व्योमन् ।।
(अथर्ववेद, १६/५३।३)
और भी कहा है -
हे मनुष्यो ! मैं तुम्हें ऐहिक तथा आ ष्मिक सुखों को देनेवाले चार कुम्भ-पों का निर्माण कर च स्थानों (हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक) में प्रदान करता हूँ।'
(क) 'चतुरः कुम्भांश्चतुर्धा ददामि ।'
अथर्व० ४।३४।७
कुम्भ पर्व का आरम्भ तब से है जब समुद्र मंथन से अमृत कलश निकला तो देवता उसको लेकर दौड़ पड़े, उनके पीछे-पीछे असुर दौड़ने लगे।
तब उस छीना-झपटी में वह कलश पृथ्वी पर चार जगह रखा गया। उससे अमृत की बूंदें गिर गई -
विवादे काश्यपेयानां यत्र यत्रावनिस्थले । कलशो न्यपतत्तत्र कुम्भपर्व तदोच्यते ॥ १७ ॥
देवताओं के बारह दिन यह छीना-झपटी चली तो पृथ्वी पर बारह वर्ष बीत गए।
इन बारह वर्षों में बारह बार कलश को उतारा गया तो बारह कुंभ स्थल हुए।
इनमें से चार स्थल पृथ्वी पर और आठ स्थल अंतरिक्षादि स्थलों पर हैं जहां कुंभ स्नान का आयोजन किया जाता है-
देवानां द्वादशाहोभिर्मत्यैर्द्वादशवत्सरैः । जायन्ते कुम्भपर्वाणि तथा द्वादश संख्यया ॥ २१ ॥
पृथ्वी पर आयोजित होने वाले चारों कुंभों में तो देवता और मनुष्य दोनों आते हैं लेकिन अंतरिक्ष आदि में आयोजित होने वाले कुम्भों में देवता ही पहुंच सकते हैं, मनुष्य की सामर्थ्य वहां पहुंचने की नहीं है --
तत्राघनुत्तये नृणां चत्वारो भुवि भारते । अष्टौ लोकान्तरे प्रोक्ता देवैर्गम्या न चेतरैः ॥ २२ ॥
जो व्यक्ति इन कुंभों में स्नान करता है तो देवता भी उस पावनात्मा को नमस्कार करते हैं --
तान्येति यः पुमान् योगे सोऽमृतत्वाय कल्पते । देवा नमन्ति तत्रस्थान् यथा रङ्का धनाधिपान् ॥२३॥
पृथिव्यां कुम्भयोगस्य चतुर्धा भेद उच्यते । विष्णुद्वारे तीर्थराजेऽवन्त्यां गोदावरीतटे ।। सुधाविन्दुविनिक्षेपात् कुम्भपर्वेति विश्रुतम् ॥ २४ ॥
स्कन्द पुराण
कुम्भ-पर्व के चार तीर्थस्थान--
कुम्भ का पर्व हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक इन चार तीर्थस्थानों में मनाया जाता है। ये चारों ही एक से एक बढ़कर परम पवित्र तीर्थ हैं। इन चारों तीर्थों में प्रत्येक बारह वर्ष के बाद कुम्भ-पर्व होता है। लिखा भी है-
गङ्गाद्वारे प्रयागे च धारा-गोदावरीतटे । कुम्भाख्येयस्तु योगोऽयं प्रोच्यते शङ्करादिभिः ॥
'गङ्गाद्वार (हरिद्वार), प्रयाग, धारानगरी (उज्जैन) और गोदावरी (नासिक) मैं शङ्करादि देवगण ने 'कुम्भयोग' कहा है।'
अबकी बार तीर्थराज प्रयाग में पावन कुंभ का आयोजन हो रहा है । तीर्थराज प्रयाग का बहुत महत्त्व शास्त्र में लिखा है-
कार्तिक महीने में एक हजार बार गङ्गा में स्नान करने से, माघ में सौ बार गङ्गा में स्नान करने से और वैशाख में करोड़ बार नर्मदा में स्नान करने से जो फल होता है वह प्रयाग में कुम्भ पर्व पर सिर्फ एक ही बार स्नान करने से प्राप्त होता है -
सहस्रं कार्तिके स्नानं माघे स्नानशतानि च । वैशाखे नर्मदा कोटिः कुम्भस्नानेन तत्फलम् ।। (स्कन्दपुराण)
विष्णुपुराण में भी लिखा है-
हजार अश्वमेध यज्ञ करने से, सौ वाजपेय यज्ञ करने से और लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो फल प्राप्त होता है वह फल केवल प्रयाग के कुम्भ के स्नान से प्राप्त होता है -
अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च । लक्षं प्रदक्षिणा भूमेः कुम्भस्नानेन तत्फलम् ।।
मेषराशिंगते जीवे मकरे चन्द्रभास्करौ । अमावास्था तदा योगः कुम्भाख्यस्तीर्थनायके ।॥
(स्क० पु०)
#विशेष -
कुंभ में ग्रहों की विशेष स्थिति से
ही अमृत का स्रोत निकलता है -
'जिस समय बृहस्पति मेष/वृष राशि पर स्थित हो तथा चन्द्रमा और सूर्य मकर राशि पर हो तो उस समय तीर्थराज प्रयाग में कुम्भ-योग होता है।'
मकरे च दिवानाथे ह्यजगे च बृहस्पतौ । कुम्भयोगो भवेत्तत्र प्रयागे ह्यतिदुर्लभः ।।
वृषराशिगते जीवे मकरे चन्द्रभास्करौ। अमावस्यां तदा योगः कुम्भाख्य तीर्थनायकी ।।
मकरे च दिवानाथे वृषराशिगते गुरौ। प्रयागे कुम्भयोगो वै माघमासे विधुक्षये ।।
क्यों कि सूर्य चन्द्र और बृहस्पति को कुंभ की सुरक्षा के लिए नियुक्त किया गया था।
उन देव ग्रहों की विशेष ज्योतिषीय स्थिति में ही कुंभ के स्थानों अमृत
का झरना तत्तद् तीर्थों में बहता है।
इस बार कुंभ तीर्थों के राजा प्रयागराज में हो रहा है। प्रयाग में तो वैसे भी माघ मास में कल्पवास होता है जो परम पावन है। वहां साधु सम्पूर्ण माघ मास में रहकर स्नानादि करते हुए उपासना करते हैं।
अबकी बार कुंभ का संयोग होने से तो और भी महत्व बढ़ गया है।
अथ प्रयागमाहात्म्यम् --
संक्षेपेण प्रवक्ष्यामि महिमानं प्रयागजम् । षष्टिर्गणसहस्राणि तत्र रक्षन्ति जाह्ववीम् ॥१॥
मार्कण्डेय ऋपि युधिष्ठिर जी से बोले हे राजन् ! संक्षेप में
प्रयागराज का माहात्म्य वर्णन करता हूँ। तीर्थराज (प्रयाग) में श्री गंगाजी की प्रतिदिन साठ (६००००) हजार गण रक्षा करते हैं।
यमुनां रक्षति सदा सविता सत्यवाहनः । प्रयागं तु विशेषेण स्वयं रक्षेत्प्रजापतिः ॥२॥
सत्यवाहन (सूर्यनारायण भगवान् प्रतिदिन श्री यमुनाजी की रक्षा करते हैं और प्रयाग की तो विशेष रूप से स्वयं प्रजापति (ब्रह्मा) जी रक्षा करते हैं।
मण्डलं रक्षति हरिदैवतैः परिवारितः । तं वटं रक्षति शिवः शूलपाणिर्महेश्वरः ।।३।।
सम्पूर्ण देवताओं के सहित विष्णु भगवान् नरों के मण्डल की रक्षा करते हैं और शूलपाणि श्री महादेवजी उस अक्षय वट- वृक्ष की रक्षा करते हैं।
स्थानं रक्षन्ति वै देवाः सर्वपापहरं शुभम् । अधर्मेणावृता लोका नैव गच्छन्ति तत्पदम् ।।४।।
सम्पूर्ण पापों को नाश करने वाले उस स्थान की देवता लोग रक्षा करते हैं, किन्तु अधर्मी लोग उस उत्तम स्थान को कभी प्राप्त नहीं कर सकते ।
अल्पमल्पतरं पापं यदा तस्य नराधिप । प्रयागं स्मरमाणस्य सर्वमायाति संक्षयम् ॥५॥
हे राजन् ! अल्प से अल्पतर भी पाप केवल प्रयागराज के स्मरण से ही सम्पूर्ण नष्ट हो जाते हैं।
दर्शनात्तस्य तीर्थस्य नाम संकीर्तनादपि । मृत्तिका लभनाद्वापि नरः पापात्प्रमुच्यते ॥६॥
प्रयागराज के दर्शन तथा नाम-कीर्तन से और वहाँ की मृत्तिका लेपन करने से मनुष्य तत्काल ही सर्वप्रकार के पापों से छूट जाता है।
पञ्च कुण्डानि राजेन्द्र येषां मध्ये तु जाह्नवी । प्रयागदर्शनादेव पापं नश्यति तत् क्षणात् ॥७।।
हे राजन् ! जिन पांच कुण्डों के बीच में श्री गंगाजी बहती हैं सो वहाँ प्रयागराज का दर्शन करने से नर तत्काल ही सञ्चित पापों से मुक्त हो जाता है।
योजनानां सहस्त्रेषु यो गंगां स्मरते नरः । अपि दुष्कृतकर्मासौ लभते परमं पदम् ॥८॥
हजारों कोश दूर होनेपर भी जो गङ्गाजी का स्मरण करता है वह चाहे कितना भी पापी क्यों न हो अवश्य ही परम उत्तम पदको प्राप्त होता है।
ब्रह्मचारी वसेन्मासं पितृदेवांश्च तर्पयेत् । गंगा-यमुनयोश्चैव संगमे स्नानमाचरेत् ॥६॥
ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता हुआ जो प्राणी एक मास अर्थात् माघ महीने में कल्पवास करता है और पितरों का तथा देवताओं का तर्पण करता है एवं प्रतिदिन गङ्गा-यमुना के सङ्गम में विधिपूर्वक स्नान करता है वह परम कल्याण को प्राप्त होता है।
प्राप्यते मानवैः पुण्यं प्रयागे तु युधिष्ठिर । देव-दानव-गन्धर्वा ऋपयः सिद्धचारणाः ॥१०॥
हे युधिष्ठिर ! प्रयागराज में स्नान करने से मनुष्य अत्यन्त उत्तम पुण्य का भागी होता है अतएव देव, दानव, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध और चारण आदि सभी प्रयागराज की विशेष इच्छा रखते हैं।
तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र स्वर्गलोकमुपाश्नुते । अपि दुष्कृतकर्माणो ये नरा दुःखभागिनः ।॥११॥
हे राजेन्द्र ! कितना भी दुराचारी आदमी क्यों न हो वह भी प्रयागराज में स्नान करने से स्वर्गलोक को प्राप्त होता है।
क्षेत्रदर्शनमात्रेण जायन्ते सुखिनो नराः । पृथिव्यामटमाना ये लभन्ते शर्मणः क्वचित् ।।१२।।
पृथ्वी में इधर उधर विचरता हुआ जो आदमी कहीं पर भी शान्ति को प्राप्त नहीं होता वह केवल प्रयाग क्षेत्र में गंगा-यमुना के संगम देखने से ही परम शान्ति को प्राप्त होता है।
वेणीदर्शनमात्रेण जायन्ते सुखिनो नराः । भूतप्र तपिशाचा वा वेणीपानीय विन्दुभिः ।।१३।।
त्रिवेणी के दर्शन तथा स्नान से मनुष्य अलभ्य सुख को प्राप्त होता है और भूत, प्रेत, पिशाच तथा वेताल योनियों में विचरने वाले प्राणी त्रिवेणी के केवल जल-बिन्दु के स्पर्शमात्र से स्वर्गगामी होते हैं।
स्पृष्टमात्रा विमुच्यन्ते दिव्यदेहधरा नृप ।
स्वर्गलोकं प्रयान्त्येव निष्पापाः शुद्धमानसाः ॥१४॥
और वे दिव्य शरीर को धारण कर हे राजन् सञ्चित पापों से छूटकर परम पद को प्राप्त होते हैं।'
तीर्थराजप्रयागस्य माहात्म्यं कथयिष्यति ।
श्रुणुयात्सततं भत्तत्या वाञ्छितं फलमाप्नुयात् ।।१५।।
हे राजन् ! तीर्थराज प्रयाग के माहात्म्य को जो भक्ति से सर्वदा कहेंगे अथवा सुनेंगे वे प्राणी अपने वाञ्छित फल को प्राप्त करेंगे।
इति मत्स्यपुराणोक्त प्रयागमाहात्म्यं समाप्तम् ।
विशेष --
कुम्भ पर्व में स्नान करने के पूर्व कलश (कुम्भ) मुद्रा दिखला कर और उसमें अमृत की भावना करके ही स्नान करना चाहिये।
अतः सभी धर्मावलंबी प्रयाग कुंभ में पधारें।
हमारा वहां ११-१४ जनवरी तक प्रवास रहेगा।
कृष्ण चन्द्र शास्त्री
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र
२६.१२.२४
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