चल रे मन संगम तीर | प्रयागराज महाकुंभ 2025 पर कविता | कविता
होकर थोड़ा धीर गंभीर, चल रे मन संगम तीर ।
चल रे मन संगम तीर ।
होकर थोड़ा धीर गंभीर, चल रे मन संगम तीर ।
चल रे मन संगम तीर ।
गंगा यमुना और सरस्वती
गंगा यमुना और सरस्वती, का मिलेगा पवन नीर
चल रे मन संगम तीर ।
चल रे मन संगम तीर ।
वहीं तीर्थराज प्रयाग बसे हैं।
वहीं तीर्थराज प्रयाग बसे हैं।
जिनके साथ पुष्कर राज बसे हैं।
(तीर्थराज) अपनी सात पटरानियों के संग।
धारकर मानव शरीर।
चल रे मन संगम तीर ।
होकर थोड़ा धीर गंभीर, चल रे मन संगम तीर ।
चल रे मन संगम तीर ।
संत समागम बहुत बड़ा है।
जिसमें आए साधु संत महंत वीर
चल रे मन संगम तीर ।
होकर थोड़ा धीर गंभीर, चल रे मन संगम तीर ।
चल रे मन संगम तीर ।
संत जन बसा रहे तंबुओं की नगरी
संत जन बसा रहे तंबुओं की नगरी
प्रयाग संगम के तीर
होकर थोड़ा धीर गंभीर, चल रे मन संगम तीर ।
होकर थोड़ा धीर गंभीर, चल रे मन संगम तीर ।
एक मास का कल्पवास करें हैं।
एक मास का कल्पवास करें हैं।
ऐसे संत वहां बसे हैं।
एक मास का कल्पवास करें हैं।
ऐसे संत वहां बसे हैं।
उनके दर्शनों को मन है अधीर।
प्रयाग संगम के तीर
होकर थोड़ा धीर गंभीर, चल रे मन संगम तीर ।
होकर थोड़ा धीर गंभीर, चल रे मन संगम तीर ।
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