आलौकिक एवं महादिव्य 'कुम्भ-महापर्व-प्रयागराज' (29 जनवरी 2025 ई.)
आलौकिक एवं महादिव्य 'कुम्भ-महापर्व-प्रयागराज' (29 जनवरी, 2025 ई.)

[कुम्भपर्व का उद्गम, माहात्म्य, स्नान तिथियां एवं स्नानविधि आदि]
[लेखक : पं. विवेक शर्मा]
कुम्भ महापर्व' एवं कुम्भ मेला भारतवर्ष का सबसे बड़ा मेला है। यह महापर्व भारत की प्राचीन गौरवमयी वैदिक संस्कृत्ति एवं सभ्यता का प्रतीक है। इस महापर्व के अवसर पर समस्त भारतवर्ष से ही नहीं, अपितु विश्व के अनेक देशों से करोड़ों की संख्या में धर्मपरायण श्रद्धालु लोग भारत के चारों तीथों में से किसी एक तीर्थ पर पवित्र व पुण्य स्नान, दान, जपादि हेतु इकट्ठे होकर भव्य एवं विराट उत्सव का समायोजन करते हैं। 'कुम्भ' शब्द का अर्थ है घर या घड़ा और 'कुम्भ' का अर्थ विश्व ब्रह्माण्ड भी है। जहाँ पर विश्वभर के धर्म, जाति, भाषा, संस्कृति, महात्माओं एवं सामान्य श्रद्धालुजनों का समागम हो, वही कुम्भ महापर्व कहलाता है।
कुम्भ-पर्व के सम्बन्ध में वेद-पुराणों में अनेक महत्त्वपूर्ण मन्त्र एवं प्रसंग मिलते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि कुम्भ-महापर्व अत्यन्त प्राचीन, प्रामाणिक एवं वैदिक धर्म से ओत-प्रोत है। 'ऋग्वेद' के दशम मण्डल के अनुसार कुम्भ-पर्व में जाने वाला मनुष्य स्वयं स्नान, दान होमादि सत्कर्मों के फलस्वरुप अपने पापों को वैसे ही नष्ट करता है, जैसे कुठार वन को काट देता है। जिस प्रकार नदी अपने तटों को काटती हुई प्रवाहित होती है, उसी प्रकार कुम्भ-पर्व मनुष्य के पूर्व सञ्चित कर्मों से प्राप्त हुए मानसिक व शारीरिक पापों को नष्ट करता है और नूतन (कच्चे) घड़े की तरह निजस्वरूप को नष्ट कर संसार में नवीन सुवृष्टि प्रदान करता है।" (ऋग्वेद)
कालचक्र में सूर्य, चन्द्रमा और देवगुरु बृहस्पति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इन तीनों ग्रहों का योग ही कुम्भ पर्व का प्रमुख आधार है। प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक-इन सभी तीर्थों पर प्रत्येक 12 वर्षों के पश्चात् सूर्य, चन्द्र व बृहस्पति-इन तीनों का विशेष योग बनने पर कुम्भ महापर्व का समागम होता है। माघ मास की अमावस को जब सूर्य और चन्द्रमा मकर राशि पर तथा बृहस्पति वृष राशि में स्थित हो, तो उस समय तीर्थराज प्रयाग में कुम्भ-महापर्व का योग बनता है, यथा-
मकरे च दिवानाथे वृषगे च बृहस्पती।
कुम्भयोगो भवेत् तत्र प्रयागे हि अतिदुर्लभे ।। (स्कन्द पुराण)
वि. संवत् 2081 मध्ये 29 जनवरी, 2025 ई., बुधवार के दिन माघ (मौनी) अमावस को सूर्य व चन्द्रमा मकर राशि में संयोग करेंगे तथा गुरु वृष राशि में संचार होने से प्रयागराज में त्रिवेणी के तट पर कुम्भ महापर्व का आयोजन होगा। त्रिवेणी पर प्रमुख स्नान, जप-पाठ, दानादि का विशेष पुण्यकाल सूर्योदय (6:47) से 4 घड़ी पूर्व (अरुणोदय काल) से अर्थात् प्रातः 5घं. 11मिं. से मध्याह्न तक रहेगा।
मानव जीवन का परम एवं चरम लक्ष्य है-अमृतत्व की प्राप्ति। 'अमृत' परम व्योम में व्याप्त है। 'कुम्भ-रूपी' जीवात्मा में 'सहस्रार' ही परम व्योम है। 'कुम्भी' साधक प्राण-अपान की एकता सम्पादन कर परम व्योम (सहस्रार) में स्थित 'अमृत' की प्राप्ति करते हैं। यह 'अमृत' प्राप्ति ही 'कुम्भी' साधक का परम लक्ष्य है, क्योंकि (अथर्ववेद, १०-८-४४)-
अकामो धीरो अमृतः स्वयम्भूः, रसेन तृप्तो न कुताश्चनोनः । तमेव विद्वान् न विभाय, मृत्योः आत्मानं धीरमजरं युवानम् ।।
अर्थात् कामनाओं को मथनेवाला-कामनाओं से रहित-धीर-अमृत-स्वयम्भू-स्वरूप होता हुआ-ब्रह्म-रस से तृप्त होकर निश्चल जरा-व्याधि-रहित सर्वदा युवा रूप वाला होकर मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है।
'कुम्भ-पर्व' की परम्परा भारत में अत्यन्त प्राचीन है। यह महापर्व भारत की प्राचीन गौरवमयी वैदिक संस्कृति एवं सभ्यता का प्रतीक है। वैसे 'कुम्भ' शब्द का अर्थ साधारणतः घड़ा ही है, किन्तु इसके पीछे जनसमुदाय में पात्रता के निर्माण की रचनात्मक शुभभावना, मङ्गलकामना एवं जनमानस के उद्धार की प्रेरणा निहित है। यथार्थतः 'कुम्भ' शब्द समग्र सृष्टि के कल्याणकारी अर्थ को अपने-आप में समेटे हुए है। पृथ्वी को कल्याण की आगामी सूचना देने के लिए या शुभ भविष्य के संकेत के लिए हरिद्वार, प्रयाग आदि पुण्य-स्थान विशेष के उद्देश्य से निर्मल महाकाश में बृहस्पति आदि ग्रहराशि उपस्थित हों जिसमें, उसे 'कुम्भ' कहते हैं।
भूमण्डल के मनुष्य मात्र के पाप को दूर करना ही कुम्भ की उत्पत्ति का हेतु है। यह पर्व प्रत्येक बारहवें वर्ष हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक-इन चारों स्थानों में होता रहता है। इस महापर्व के अवसर पर समस्त भारतवर्ष से ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व से करोड़ों धर्मपरायण श्रद्धालु लोग कुम्भ-स्थली पर स्नान, दान, जपादि हेतु इकट्ठे होकर भव्य एवं विराट मेले (उत्सव) का समायोजन करते हैं। 'कुम्भ' शब्द का अर्थ विश्व ब्रह्माण्ड भी है। जहाँ पर विश्वभर के धर्म, जाति, भाषा, संस्कृति, महात्माओं एवं सामान्य श्रद्धालुजनों का समागम हो, वही कुम्भ महापर्व कहलाता है।
कुम्भ-पर्व के सम्बन्ध में वेद-पुराणों में अनेक महत्त्वपूर्ण मन्त्र एवं प्रसंग मिलते हैं। जिससे सिद्ध होता है कि कुंभ महापर्व अत्यंत प्राचीन और वैदिक धर्म से ओत-प्रोत है।
ऋग्वेद अनुसार 'कुम्भ' पर्व में जाने वाला मनुष्य स्वयं दान-होमादि सत्कर्मों के फलस्वरूप अपने पापों को वैसे ही नष्ट करता है जैसे कुठार वन को काट देता है। जिस प्रकार गङ्गा नदी अपने तटों को काटती हुई प्रवाहित होती है, उसी प्रकार कुम्भ-पर्व मनुष्य के पूर्वसञ्चित कर्मों से प्राप्त हुए शारीरिक पापों को नष्ट करता है और नूतन (कच्चे) घड़े की तरह बादल को नष्ट-भ्रष्ट कर संसार में सुवृष्टि प्रदान करता है।
अमृत-कुम्भ का स्वरूप
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः ।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्थिताः ।।
कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा ।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः।
अंगेश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः ।।
'कलश के मुख में विष्णु, कण्ठ में रुद्र, मूल भाग में ब्रह्मा, मध्य भाग में मातृगण, कुक्षि में समस्त समुद्र, पहाड़ और पृथ्वी रहते हैं और अङ्गों के सहित ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद भी रहते हैं।'
अमृत-कुम्भ की अवधारणा
कालचक्र न केवल जीवन के क्रिया-कलाप का मूलाधार है; अपितु समस्त यज्ञकर्म, अनुष्ठान एवं संस्कार आदि भी कालचक्र पर आधारित हैं। कालचक्र में सूर्य, चन्द्रमा एवं देवगुरु बृहस्पति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक-इन सभी चार तीर्थों पर हर बारह (12) वर्षों के पश्चात् सूर्य, चन्द्र व बृहस्पति-इन तीनों का विशेष योग बनने पर कुम्भ महापर्व का समागम होता है। माघ मास की अमावस पर जब सूर्य और चन्द्रमा मकर राशि पर तथा बृहस्पति वृष राशि पर स्थित हों, तो उस समय तीर्थराज प्रयागराज में कुम्भ महापर्व का शुभ योग बनता है। यथा-
मकरे च दिवानाथे वृषगे च बृहस्पतौ।
कुम्भयोगो भवेत् तत्र प्रयागे हि अतिदुर्लभे ।। (स्कन्दपुराण)
वि संवत् 2081 में माघ (मौनी) अमावस के दिन अर्थात् 29 जनवरी, 2025 ई. को सूर्य और चंद्र मकर में और गुरु वृष राशि में होगा। अतः इस दिन प्रयागराज में कम्भपर्व का योग है। घंटा घड़ियालों के साथ गूंजते वेद मंत्र और धूप-दीप की सुगंध, रोशनी से नहाए पंडालों, धूनी जमाए साधना में लीन साधुओं के साथ संगम नगरी प्रयागराज में कुम्भ-महापर्व के दौरान आस्था का ऐसा जमघट लगेगा, जिसे देखने के लिए न सिर्फ भारत बल्कि सात समंदर पार से भी श्रद्धालु और सैलानी आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति एवं आधिभौतिक दुःखों से मुक्ति हेतु यहाँ खींचे चले आएंगे। उत्तरप्रदेश तथा केन्द्रीय सरकार इस कुम्भ मेले पर श्रद्धालुओं के आवास, स्नान, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सुविधा आदि हेतु करोड़ों रुपये व्यय करेंगी। त्याग, समर्पण तथा श्रद्धा के केन्द्र इस महापर्व पर रिकॉर्ड तोड़ करोड़ों श्रद्धालुओं के आने का अनुमान है। इसीलिए हम श्रद्धालु पाठकों के लिए इस कुम्भपर्व के उद्गम, स्नानदिन तथा कुम्भपर्व के अवसर पर किए जाने योग्य दानादि धर्मकृत्यों पर विस्तृत प्रकाश डाल रहे हैं।
कुम्भ-स्नान का माहात्म्य
त्रिवेणी अर्थात् गंगा, यमुना व सरस्वती तीनों पावन नदियों के संगम पर माय मास एवं कुम्भ पर्व पर स्नान, जप-पाठ एवं दानादि का धर्मशास्त्रों में विशेष माहात्म्य वर्णित किया गया है। विधिपूर्वक माघ स्नान से बढ़कर कोई पवित्र और पापनाशक पर्व नहीं। माघ मास में कुम्भपर्व पर प्रयागराज में व्यक्ति तीन दिन भी नियमपूर्वक स्नान कर लेता है, तो उसे एकसहस्र अश्वमेघ यज्ञों को करने के बराबर पुण्य प्राप्त हो जाता है-
प्रयागे माघमासे कुम्भपर्वे तु, त्र्यह स्नानस्य यत् फलम्।
अश्व-मेध-सहस्रेण, तत् फलं लभते भुवि ।।
प्रयाग में गङ्गा, यमुना एवं सरस्वती (त्रिवेणी) के संगम में स्नान करके प्राणी अनेक पापों से मुक्त होकर स्वर्गिक सुखों का अधिकारी हो जाता है
कुम्भपर्व क्यों लगातार मनाए जाते हैं ? (कुम्भोत्पत्ति की अमरकथा)
कुम्भ की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पुराणों में अनेक आख्यान मिलते हैं। इनमें स्कन्द पुराण में समुद्र मन्थन की कथा सर्वाधिक प्रचलित है। इस कथा के अनुसार 'हिमालय' के समीप 'क्षीरोद' नाम का एक सागर है। एक समय देवताओं और दानवों के बीच अमृत कुम्भ की प्राप्ति के लिए सागर के मूल में कूर्म (कच्छप) और उसके ऊपर मन्दरांचल पर्वत को स्थापित करके उस पर 'वासुकि' नाग की रस्सी बनाकर मन्थन किया गया। समुद्र मन्थन द्वारा क्षीरसागर से चौदह (14) रत्न निकले। जैसे- (1) कालकूट विष, (2) पुष्पक विमान, (3) ऐरावत हाथी, (4) पारिजात वृक्ष, (5) अप्सरा रम्भा, (6) कौस्तुभ मणि, (7) बाल चन्द्रमा, (8) कुण्डल धनुष, (9) शार्ग धनुष, (10) कामधेनु गाय, (11) उच्चैश्रवा घोड़ा, (12) समस्त ऐश्वर्यों की अधिष्ठातृ लक्ष्मी, (13) विश्वकर्मा (14) अन्त में महाविष्णु धनवन्तरि के हाथों में शोभायमान अमृत से आपूरित कुम्भ (कलश) उत्पन्न हुआ। देवताओं के संकेत पर इन्द्र पुत्र जयन्त अमृत-कुम्भ लेकर बड़े वेग से भागने लगे। दैत्यगण जयन्त का पीछा करने लगे। अमृत प्राप्ति के लिए देवताओं और राक्षसों के मध्य बारह दिव्य दिन (मानुषी बारह वर्ष) तक भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध के समय जिन-जिन स्थानों पर 'कुम्भ' से अमृत की बूंदे गिरी थी, उन-उन स्थानों (प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कुम्भ-महापर्व मनाया जाता है। तत्पश्चात् भगवान् श्रीविष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके अमृत को देवताओं में बांटा।
पुराणानुसार 'अमृत-कुम्भ' की रक्षा में बृहस्पति, सूर्य व चन्द्रमा ने विशेष सहायता की थी। 'चन्द्रमा' ने अमृत को कुम्भ में से गिरने से, 'सूर्य' ने कुम्भ को फूटने से बृहस्पति असुरों द्वारा अमृतके अपहरण होने से तथा शनि ने देवराज इंद्र के भय से से अमृत कुम्भ की रक्षा की थी। इसी कारण सूर्य, चन्द्रः और बृहस्पति-तीनों ग्रहों के विशेष योग में ही कुम्भ महापर्व मनाया जाता है।
कुम्भ-महापर्व 12वें वर्ष क्यों ?
जिस समय में चन्द्रादि ग्रहों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले सूर्य चन्द्रादि ग्रह जब वहीं आते हैं, उस समय कुम्भ का योग होता है। अर्थात् जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में जहाँ-जहाँ अमृत कुम्भ सुधा-बिन्दु गिरा था, वहाँ-वहाँ कुम्भपर्व होता है।
क्योंकि सन् 2025 ई. में माघी अमावस के दिन सूर्य बन्द्रमा मकर राशि में तथा बृहस्पति वृष राशि में होंगे, तद्नुसार कुम्भ-महापर्व का मुख्य स्नान 29 जनवरी, 2025 ई. को ही होगा।
निष्कर्ष-गंगा-यमुना की रेती सनातन मतावलंबियों से पहली बार कब गुलजार हुई, इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है, लेकिन त्रेतायुग में भी कल्पवास जैसी परम्परा थी। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने इस बात का प्रमाण इस चौपाई से दिया है-
माघ मकरगत रबि जब होई, तीरथपतिहिं आव सब कोई।
देव दनुज किन्नर नर श्रेनीं। सादर मज्जहि सकल त्रिबेनी।
वस्तुतः कुम्भ-पर्व केवल देव-दानवों के कुम्भ कलश के लिए उत्पन्न झगड़े की कहानी नहीं है, अपितु इस पर्व के माध्यम से भारतीय संस्कृति और धर्म से अनुप्राणित सभी सम्प्रदायों के धर्मानुयायी एकत्रित होकर अपने समाज, धर्म एवं राष्ट्र की एकता, अखण्डता, अक्षुण्णता के लिए विचार विमर्श करते हैं। स्नान, दान, तर्पण तथा यज्ञ का पवित्र वातावरण देवताओं को भी आकृष्ट किए बिना नहीं रहता। ऐसी मान्यता है कि इस महापर्व पर सभी देवगण तथा अन्य पितर-यक्ष-गन्धर्व आदि पृथ्वी पर उपस्थित होकर न केवल मनुष्यमात्र, अपितु जीवमात्र को अपनी पावन उपस्थिति से पवित्र करते हैं।
प्रयाग-कुम्भपर्व में स्नान का माहात्म्य
त्रिवेणी अर्थात् गंगा, यमुना व सरस्वती-तीनों पावन नदियों के संगम पर माघ मास एवं कुम्भ पर्व पर स्नान, जप-पाठ एवं दानादि का धर्मशास्त्रों में विशेष माहात्म्य वर्णित किया गया है। विधिपूर्वक माघ स्नान से बढ़कर कोई पवित्र और पापनाशक पर्व नहीं। माघ मास में कुम्भ पर्व पर प्रयागराज में व्यक्ति तीन दिन भी नियमपूर्वक स्नान कर लेता है, तो उसे एक सहस्र अश्वमेघ यज्ञों को करने के बराबर पुण्य प्राप्त हो जाता है-
प्रयागे माघमासे, कुम्भपर्वे तु, त्र्यह-स्नानस्य यत् फलम् ।।
अश्व-मेघ-सहस्रेण, तत्, फलं लभते भुवि ।।
तीर्थराज प्रयाग में गङ्गा, यमुना एवं सरस्वती (त्रिवेणी) के संगम में स्नान करके प्राणी अनेक पापों से मुक्त होकर स्वर्गिक सुखों का अधिकारी हो जाता है।
प्रयाग के माहात्म्य से सारा वैदिक साहित्य भरा पड़ा है। पद्मपुराण का वचन है
'ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी।
तीर्धानामुत्तमं तीर्थ प्रयागाख्यमनुत्तमम् ।।
*जैसे ग्रहों में सूर्य तथा ताराओं में चन्द्रमा हैं, वैसे ही तीर्थों में प्रयाग सर्वोत्तम है।'
प्रयाग-कुम्भपर्व (29 जन., 2025 ई.) की पुण्य स्नानतिथियाँ
यद्यपि कुम्भ-पर्व का मुख्य योग माध अमावस, 29 जनवरी, 2025 ई. की है, परन्तु पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा (चान्द्र माघ मास) अथवा मकर संक्रान्ति से कुम्भ संक्रान्ति (सौर माघ मास) प्रतिदिन प्रातः किसी भी नदी, तालाब, तीर्थ पर नियमपूर्वक स्नान किया जाए तो उसका शास्त्रों में बहुत माहात्म्य लिखा है-
'माघमासे च यः स्नायान्नैरन्तर्येण भारत ।
पौण्डरीक फलं तस्य दिवसे दिवसे भवेत् ।।'
इस मासावधि चलने वाले माघस्नान की कुछ तिथियां तो विशेष योगों के साथ सम्बन्ध होने से बहुत पवित्र मानी गई हैं। कुम्भ मेले में एक मास तक कल्पवास (प्रयागवास) करने वाले सन्तों अथवा साधारण श्रद्धालुओं को भी इन विशेष पुण्यदायक तिथियों में त्रिवेणीसंगम पर स्नान, दान करने से विशेष पुण्य लाभ होगा।
यहाँ हम उन सभी पावन पुण्यदायक तिथियों का विवरण दे रहे हैं, जिनमें त्रिवेणी संगम में स्नानदान करने का विशेष माहात्म्य होता है। प्रयाग-कुम्भपर्व की मुख्य स्नानतिथियां इस प्रकार हैं
कुम्भ महापर्व (प्रयाग) की पुण्य स्नानतिथियाँ।
| (1) प्रथम स्नान तिथि-पौष शुक्ल एकादशी (पुत्रदा एकादशी)-10 जनवरी, 2025 ई.,
सोमवार)
शुक्रवार। (2) द्वितीय स्नान तिथि (प्रथम स्नानपर्व) पौष पूर्णिमा 13 जनवरी, 2025 ई.
जनवरी, 2025 ई., मंगलवार।
14 (3) तृतीय स्नान-प्रथम शाही स्नान-माघ कृष्ण प्रतिपदा (मकर संक्रान्ति)-
(4) चतुर्थ स्नानतिथि-माघ कृष्ण एकादशी 25 जनवरी, 2025 ई., शनिवार।
(5) पंचम स्नानतिथि-माघकृष्ण त्रयोदशी 27 जनवरी, 2025 ई., सोमवार।
(6) षष्ठ स्नान (द्वितीय) प्रमुख शाही स्नान माघ (मौनी अमावस-
-29 जनवरी, 2025 ई., बुधवार
(7) सप्तम स्नान, (तृतीय) (अन्तिम) शाही स्नान-माघ शुक्ल पंचमी (वसन्त पंचमी)-2 फरवरी, रविवार, 2025 ई.।
ध्यान दें-प्रयागराज में 3 फरवरी, 2025 ई. को अरुणोदयकाल में पंचमी तिथि विद्यमान होने से शाही स्नान 3 फरवरी, सोमवार के अरुणोद्यकाल से प्रारम्भ होगा।
(8) अष्टम स्नान तिथि (द्वितीय स्नानपर्व) माघ शुक्ल सप्तमी (रथ सप्तमी)-4 फरवरी, 2025 ई., मंगलवार।
(9) नवम स्नानतिथि-माघ शुक्ल अष्टमी (भीष्माष्टमी)-5 फरवरी, 2025 ई., बुधवार।
(10) दशम स्नान तिथि-माघ शुक्ल एकादशी (जया एकादशी)-8 फरवरी, 2025 ई., शनिवार।
(11) एकादश स्नानतिथि माघशुक्ल त्रयोदशी (सोम प्रदोष व्रत)-10 फरवरी, 2025 ई., सोमवार।
(12) द्वादश स्नानतिथि (तृतीय स्नानपर्व) माघ पूर्णिमा, 12 फर., 2025 ई., बुधवार
(13) त्रयोदश स्नानतिथि फाल्गुन कृष्ण एकादशी, 24 फरवरी, 2025 ई., सोमवार। (14) चतुर्दश (अन्तिम) स्नान पर्व श्रीमहाशिवरात्रि, 26 फरवरी, 2025 ई., बुधवार।
विशेष विस्तृत जानकारी के लिए गतवर्षीय 'पंचांगदिवाकर' (वि. संवत् 2081) का अवलोकन करें।
नोट-विस्तृत जानकारी एवं माहात्म्य के लिए गतवर्षीय पंचांगदिवाकर (सं. 2081) का अवश्य अध्ययन करें।
(1) कुंभ महापर्व की प्रमुख स्नान तिथियां का विस्तार सेवर्णन
पौष शुक्ल एकादशी, शुक्रवार (10 जनवरी, 2025 ई.)
इस पुत्रदा एकादशी वाले दिन कुम्भ-महापर्व के स्नान, दान का विशेष पुण्य होगा। एक परम्परा के अनुसार माधस्नान का प्रारम्भ इसी तिथि से किया जाता है।
(2) पौष पूर्णिमा, सोमवार (13 जनवरी, 2025 ई.)
पौषी पूर्णिमा के दिन तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी-सङ्गम में स्नान से विशेष पुण्यलाभ होगा। वैसे भी पौष पूर्णिमा में स्नान-दान की विशेष महिमा मानी गई है। चान्द्रगणनानुसार पौष पूर्णिमा से ही अति पावन 'माघस्नान' का श्रीगणेश होता है। प्रायः सभी पञ्चाङ्गों में 'पौष पूर्णिमा' के दिन ही माघस्नान का सङ्कल्प लिखा रहता है।
तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी-सङ्गम के पवित्र वातावरण में निवास करते हुए 'पौष पूर्णिमा' के महापर्व काल में स्नान करना निःसन्देह अमोघ फलदायक है। यह कुम्भ मेले का प्रथम 'स्नानपर्व' होगा।
(3) मकर संक्रान्ति (माघ कृष्ण प्रतिपदा), मंगलवार (14 जनवरी, 2025 ई.)
★ प्रथम शाही स्नान
14 जनवरी, 2025 ई. को सारा दिन प्रातः से सूर्यास्त तक मकर संक्रान्ति का पुण्यकाल होगा। इसदिन सूर्य मकर राशि में प्रातः 8-55मि पर प्रवेश करेंगे। यह निरयण उत्तरायण दिन है। अतएव यह दिन संक्रमण काल होने से स्नान दान के लिए पुष्यदायक होता है। सरकार एवं कुम्भ उत्सव (मेला) प्राधिकरण द्वारा इसदिन से ही कुम्भ महापर्व (प्रयाग) का विधिवत् श्रीगणेश किया जाएगा। यह कुम्भ-महापर्व (प्रयागराज) का प्रथम शाही स्नान दिन होगा। जिसमें दशनाम अखाड़े के संन्यासी क्रमानुसार स्नान करेंगे।
(4) माघकृष्ण एकादशी, शनिवार (25 जनवरी, 2025 ई.)
षटतिला एकादशी वाले दिन तीर्थराज प्रयाग में कुम्भ-स्नान, तिलदान, तिल का भोजन, तिलयुक्त जल में ऋषियों-देवताओं का तर्पण करने का विशेष विधान रहेगा तथा अक्षय पुण्य प्राप्त होगा। (5) माघ कृष्ण त्रयोदशी, सोमवार (27 जनवरी, 2025 ई.) सोम प्रदोष व्रत, शिव जलाभिषेक तथा तिलयुक्त वस्तुओं के दान के साथ-साथ स्नान का विशेष माहात्म्य होगा।
(6) कुम्भ महापर्व की प्रमुख स्नानतिथि
माघ (मौनी) अमावस, बुधवार (29 जनवरी, 2025 ई.)
★ द्वितीय (प्रमुख) शाही स्नान
माघ (मौनी) अमावस के दिन गुरु वृष में तथा सूर्य-चन्द्र मकर राशि में होंगे। इसलिए इस दिन प्रयागराज में कुम्भ महापर्व का योग बन रहा है। यह इस कुम्भ महापर्व की प्रमुख (शाही) स्नानतिथि है, जिस दिन द्वितीय (प्रमुख) शाही स्नान होगा। इस दुर्लभ महापर्व में त्रिवेणी संगम पर स्नान करने से अक्षय पुण्य लाभ होगा। इसीदिन षड्दर्शन के शंकराचार्यादि सन्त महात्मा (संन्यासी, उदासीन, निर्मल, वैष्णव, अग्नि व खालसे अखाड़े) अपने शिष्यों सहित प्रमुख शाही यात्रा निकालकर त्रिवेणी संगम में स्नान करेंगे। शास्त्रों का कहना है कि 'कार्तिक महीने में एक हजार बार [गंगा में] स्नान करने से, माघ में सौ बार (गंगा में) स्नान करने से और वैशाख में करोड़ बार नर्मदा में स्नान करने से जो फल होता है, वह प्रयाग में कुम्भ पर्व पर केवल एक ही बार स्नान करने से प्राप्त होता है।
सहस्रं कार्तिके स्नानं माघे स्नानशतानि च।
वैशाखे नर्मदा कोटिः कुम्भस्नानेन तत्फलम् ।। (स्कन्दपुराण)
इस परमपावन महापर्व पर त्रिवेणी में स्नान करके महापुण्य अर्जित किया जा सकता है। यदि अत्यधिक भीड़ के कारण इस योग की कालावधि में त्रिवेणी में स्नान का अवसर न मिल सके तो किसी अन्य पवित्र धारा (गङ्गा, यमुना, नर्मदा) में भी स्नान दानादि से इस योग के माहात्म्य का लाभ अर्जित किया जा सकता है।
इसदिन प्रयागराज में सूर्योदय 6घंटा 47 मिनट से लगभग 1घंटा 36 मिनट पहिले प्रातः 5 घंटा 11 मिनट से अरुणोदयकाल प्रारम्भ हो जाएगा। अरुणोदय समय (54घंटा 11मिनट) से कुम्भ-पर्व का स्नान-माहात्म्य प्रारम्भ हो जाएगा। माधी अमावस के दिन श्रवण नक्षत्र भी विद्यमान् रहने से कुम्भ-पर्व का माहात्म्य अनन्त गुणा अधिक रहेगा।
(7) वसन्त पञ्चमी (माघशुक्ल पंचमी), रवि सोम (2/3 फरवरी, 2025 ई.)
★ तृतीय (अन्तिम) शाही स्नान
वसन्त पञ्चमी (माघशुक्ल पंचमी), रवि सोम (2/3 फरवरी, 2025 ई को प्रातः 9घंटा 15मिनट बाद पंचमी तिथि पूर्वाहन कालिक रहने से वसन्त पंचमी के दिन स्नान-दान का अनूठा महत्त्व रहेगा। इस दिन तीसरा (अन्तिम) शाही स्नान होगा।
यद्यपि प्रयागराज में 3 फरवरी, 2025 ई. को सूर्योदय 6घ 45 मि पर होने से, माघशुक्ल पंचमी तिथि उदय-व्यापिनी 3 फरवरी, 2025 ई. को होगी। परन्तु त्रिमुहूर्त न्यून होने से तथा पहिले दिन (2 फरवरी) पंचमी तिथि पूर्वाहण-व्यापिनी होने से वसन्त-पंचमी प्रयागराज में भी 2 फरवरी, 2025 ई. को ही शास्त्र सम्मत होगी।
[ यद्यपि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् द्वारा सम्भव है कि 2 फरवरी, 2025 ई. की बजाए 3 फरवरी, 2025 ई. को सूर्योदय-व्यापिनी पंचमी तिथि (6घ 45 मि. से 6घ 53 मि. तक) के दिन ही शाही-यात्रा-स्नान की उद्घोषणा कर दी जाए]
[इसलिए पाठकों को 2-3 मास पूर्व ही सरकार अथवा अखाड़ा परिषद् द्वारा उद्घोषित तारीखों से मिलान कर लेना चाहिए।]
ज्योतिष शास्त्र अनुसार तो 2 फरवरी, 2025 ई. को ही प्रातः 9घ 15 मि बाद स्नान योग होना चाहिए।
(8) माघ शुक्ल सप्तमी, मंगलवार (4 फरवरी, 2025 ई.) (आरोग्य रथ सप्तमी)
इस दिन त्रिवेणी संगम में स्वस्थ शरीर की कामना हेतु स्नान, दानादि कर भगवान् सूर्य का पूजन अर्घ्य दान देकर एवं दीपक बहाना चाहिए। पूर्वारुणोदय वाली आरोग्य सप्तमी प्राणिमात्र की जीवनशक्ति को जीवित रखने वाले प्रत्यक्ष ईश्वर सूर्य नारायण ने मन्वन्तर के आदि में इसीदिन अपना प्रकाश प्रकाशित किया था। इसदिन सूर्योदय से पहिले (1-36 मि. पूर्व) अरुणोदयकाल में स्नान दान से करोड़ों सूर्यग्रहण के समय किए गए स्नानादि तुल्य पुण्य की प्राप्ति होती है। शास्त्रानुसार-
"अरुणोदयवेलायां शुक्ला माघस्य सप्तमी।
प्रयागे यदि लभ्येत कोटिसूर्यग्रहैः समा ।।'
[ यह कुम्भ-महापर्व (प्रयाग) की द्वितीय मुख्य स्नान-पर्व तिथि भी होगी। (१) माघ शुक्ल अष्टमी, बुधवार (5 फरवरी, 2025 ई.) को भीष्माष्टमी होगी। अतः इसदिनस्नान दानादि पश्चात् भीष्म पितामह निमित्त एवं पित्तरों निमित्त तिलयुक्त तर्पण करना चाहिए।
'वसूनामवताराय शंतनोरात्मजाय च।
अर्घ्य ददामि भीष्माय आवाल्य-ब्रह्मचारिणे।'
इस मन्त्र से अर्घ्य दें।
(10) माघ शुक्ल एकादशी, शनिवार (8 फरवरी, 2025 ई.)
जया एकादशी का पुण्य व्रत धारण कर त्रिवेणी में स्नान दान करने का पुण्यतम् अवसर होगा।
(11) माघशुक्ल त्रयोदशी, सोमवार (10 फरवरी, 2025 ई.)
सोम प्रदोष व्रत वाले दिन पावन त्रिवेणी में स्नानादि के पश्चात् शिवार्चन तथा शिव अभिषेक करने से अक्षय पुण्यों की प्राप्ति का सुअवसर गंवाना नहीं चाहिए।
(12) माघ पूर्णिमा, बुधवार (12 फरवरी, 2025 ई.)
माघ पूर्णिमा कुम्भ-महापर्व (प्रयाग) की मुख्य तृतीय स्नानपर्व तिथि माना जाएगा। माघ पूर्णिमा के दिन तीर्थस्थल पर स्नान दान का शास्त्रों में अनन्त माहात्म्य वर्णित है। चान्द्रगणनानुसार माघी पूर्णिमा को माघस्नान की अन्तिम तिथि मानी जाती है।
'पूर्णिमा' तिथि की महिमा उसके नाम से ही स्पष्ट है। 'पूर्णा' शब्द के लिए यह प्रसिद्ध है कि-
पूर्णमदः पूर्णमिदं, पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्णमेवावशिष्यते।
अर्थात् यह सारा बाह्य स्वरुप 'पूर्ण' है, इसका अन्तः स्वरूप भी 'पूर्ण' से 'पूर्ण' का विकास है। यहाँ तक कि 'पूर्ण' से 'पूर्ण' को निकाल लेने पर भी 'पूर्ण' ही शेष रहता है।
अतः श्रद्धालु जनों को इस पुण्यतम् अवसर का लाभ उठाना चाहिए। इसीदिन फाल्गुन संक्रान्ति भी होने से इस तिथि में पुण्यार्जन का अवसर खोना नहीं चाहिए।
(13) फाल्गुन कृष्ण एकादशी, सोमवार (24 फरवरी, 2025 ई.)
फाल्गुन कृष्ण एकादशी, सोमवार को विजया एकादशी का व्रत रखकर, त्रिवेणी में स्नानकर दानादि का अकल्पनीय माहात्म्य होता है।
(14) फाल्गुन कृष्ण त्रयो. चतुर्दशी, बुधवार (26 फर., बुधवार)
फाल्गुन कृष्ण त्रयो. चतुर्दशी, बुधवार को श्रीमहाशिवरात्रि व्रत तिथि है। यह तिथि भी चतुर्थ (अन्तिम) स्नान पर्व होगा। इस दिन तीर्थराज प्रयागराज में स्नान दान, व्रत धारण करना परम पुण्यप्रद माना गया है।
ऊपर हमने मुख्य सभी स्नानतिथियों का विवरण लिख दिया है। इन स्नानतिथियों के अतिरिक्त माघ कृष्ण चतुर्थी, शुक्रवार (17 जनवरी, 2025 ई.) को संकष्ट चतुर्थी एवं सभी एकादशी व्रतों के दिनों में भी त्रिवेणी में स्नान करना पुण्यदायक होगा। जहाँ तक सम्भव हो तो उपरोक्त सभी स्नानतिथियों के दिन त्रिवेणी संगम स्थल पर स्नान करने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रयागराज निवासी तथा जो लोग इस कुम्भमहापर्व पर एक मास तक कल्पवास प्रयाग में करेंगे, वे पूरा माधमास प्रतिदिन त्रिवेणी में स्नान करेंगे ही। कुम्भ महापर्व पर त्रिवेणी में स्नान, दानादि की विधि प्रयागराज में त्रिवेणी संगम स्थल पर माघ (मौनी) अमावस (29 जनवरी, 2025 ई.) के दिन प्रातः स्नान-सन्ध्यादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर अरुणोदयकाल या सूर्योदयकाल के समय संकल्पपूर्वक स्नान करने से विशेष पुण्यफल मिलता है-
ॐ विष्णुर्विष्णु र्विष्णुः । ॐ तत्सद् अद्य श्री भगवतो महापुरुषस्य विष्णुराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराह-कल्पे कलियुगे कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे प्रयागक्षेत्रे कालयुक्त नाम संवतसरे २०८१ संख्यके-संवत्सरे मकरस्थे सूर्ये वृषस्थे गुरौ मासानां उत्तमे माघ मासे कृष्णपक्षे माघ अमावस्यां तिथौ, बुधवासरे (अमुक.......) गोत्रः (अमुकनामा.....) ऽहम् सर्वविधपीडा निवृत्तिपूर्वकं आरोग्य-दीर्घायुः धनधान्य पुष्टि समृद्धयार्थं, बोधाबोधपूर्वं कृतानां सर्वपापनिवृत्तिपूर्वकं सर्वाभीष्ट फलावाप्ति धर्मार्थ काममोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धयर्थं भगवत्या गङ्गायाः गङ्गा-यमुना-सरस्वती-त्रय्याः भगवान् विष्णुः शिवस्य च षोडशोपचारपूजनं च विधाय गंगा-यमुना-पावन धारायां इय प्रयाग पुण्यतीर्थे स्नान-पूजनं दानं च करिष्ये ।।
उपरोक्त संकल्पानुसार पूजन करने के पश्चात् त्रिवेणी अर्थात् संगम में प्रवेश करने से पूर्व पुष्पाक्षत, नारियल एवं रुपया/मुद्रा सहित अर्पित करते हुए यह मन्त्र पढ़ें-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु ।।
ॐ गङ्गायै नमः । ॐ यमुनायै नमः । ॐ सरस्वत्यै नमः ।।
ॐ तीर्थ-राजाय प्रयागाय नमः ।
ॐ अक्षय-वट-शोभित-त्रिवेणी-सङ्गमाय नमः ।।
फिर निम्न मन्त्रों से दोनों हाथों में जल लेकर भगवान् सूर्य से प्रार्थना करें-
अपस्त्वमसि देवेश ज्योतिषां पतिरेव च।
पापं नाशय मे देव वाङ्मनः कर्मभिः कृतम् ।।
फिर दोनों हाथों द्वारा कुम्भ मुद्रा बनाकर भगवान् विष्णु एवं सूर्यादि देवों का ध्यान करते हुए निम्न मन्त्र पढ़ें-
'दुःख-दारिद्रय नाशाय श्रीविष्णोस्तोषणाय च।
प्रातः स्नानं करोमि अद्य माघे पापविनाशनम् ।।
मकरस्थे रवौ माघे, गोविन्दाच्युत माधव।
स्नानेनानेव मे देव यथोक्त फलदो भव ।।
फिर सूर्यदेव को ताम्र-बर्तन में लाल चंदन/पुष्पाक्षत डालकर मन्त्रपूर्वक अर्घ्य देवें। मन्त्र-
'ऐहि सूर्य सहस्रांशो'
अथवा
'ॐ घृणिः सूर्याय नमः ।।'
अथवा भगवान् सूर्य के द्वादश नाम-मन्त्रों का उच्चारण करें।
तदुपरान्त ब्रह्मा, विष्णु, महेश, भगवती देवी, गंगा-सरस्वती एवं सूर्यादि देवों को जलांजली देकर नमस्कार करें।
स्नान का समय
प्रयागादि तीर्थ पर स्नान का सर्वोत्तम काल अरुणोदयकाल है। (सर्योदय से पहले पर्वक्षितिज में जो प्रकाश दिखाई देता है। उसे अरुणोदयकाल कहते हैं।) जनवरी, 2025 ई. में माघमास में यह समय सूर्योदय से लगभग 1घ 36 मिं. पहिले शुरु होगा। अरुणोदयकाल में भी स्नान के लिए वह समय सर्वोत्कृष्ट है जब तारे दिखाई दे रहे हों, उसके बाद जितना विलम्ब होता जाए कम महत्त्व का माना जाता है। ताराओं के छिपने से लेकर सूर्योदयकाल तक मध्यम है। सूर्योदय के पश्चात् का स्नान क्षणः क्षणः सामान्य माना जाता है-
'उत्तमं तु सनक्षत्रं लुप्ततारं तु मध्यमम् ।
सवितुर्युदिते भूप ततो हीनं प्रकीर्तितम् ।।
परन्तु नारदपुराण में तो सूर्योदय के बाद भी स्नान का माहात्म्य लिखा है-
'सम्प्राप्ते माघमासे तु तपस्विजनवल्लभे ।
क्रोशन्ति सर्ववारीणि समुद्गच्छति भास्करे ।।
पुनीमस्तस्य पापानि त्रिविधानि न संशयः ।।'
इसलिए कुम्भ-पर्व के मुख्य स्नान के विशेष दिन (29 जनवरी, 2025 ई.) को अरुणोदयकाल से लेकर सूर्यास्त काल तक त्रिवेणी (संगम) में स्नान, दानादि का माहात्म्य रहेगा। अतः सारा दिन किसी भी समय स्नान किया जा सकता है क्योंकि कुम्भ योग के कारण वह पूरा दिन पवित्र माना जाता है।
दानादि-स्नानोपरान्त घृत सहित अन्नादि से आपूरित कुम्भ (घड़े) को वस्त्र, अलंकार, पुष्पपत्रों से सुसज्जित कर उसकी षोडश या पंचोपचार पूर्वक पूजन करके सुवर्ण, चाँदी या वस्त्र, धनादि की दक्षिणा सहित किसी सुपात्र ब्राह्मण को संकल्पपूर्वक दान करके, तदुपरान्त धर्म-परायण श्रद्धालुओं तथा साधु महात्माओं को यथाशक्ति दक्षिणा सहित भोजन कराने से अनेकों तीर्थों में जाने का तथा सैंकड़ों गोदान करने का फल मिलता है तथा मनुष्य के पितरों की आत्माएं सन्तुष्ट होती हैं।
* जो प्रयागराज न जा सके, वे पुण्यलाभ कैसे अर्जित करें ? जो लोग किसी कारणवश प्रयागराज तीर्थे पर जाने में असमर्थ हों, वे लोग अपने निवास स्थान (घर) पर ही स्नान के पात्र में गंगा एवं यमुना का निर्मल जल डालकर भगवान् विष्णु, सूर्य एवं वरुण मन्त्र पढ़कर एवं प्रार्थनापूर्वक अन्न, वस्त्र, कलश, तिल, गुड़, फलों का दान तथा श्रीविष्णु सहस्रनाम, श्रीगङ्गा-स्तोत्र, श्रीगङ्गाष्टकम्, श्रीयमुनाष्टकम्, श्रीसरस्वतीस्तोत्र, आदित्यहृदय स्तोत्र, सूर्य के द्वादशनाम, श्रीशिव-स्तोत्र आदि स्तोत्रों का पाठ करना शुभ होता है। इस प्रकार विधिपूर्वक स्नान, जप-पाठ करने से अनेकशः कायिक एवं मानसिक पापों का क्षय होता है। श्रीविष्णु पुराण में कहा गया है कि 'हज़ारों अश्वमेघ यज्ञ करने से, सौ वाजपेय-यज्ञ करने से और लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो फल प्राप्त होते हैं, वह फल केवल प्रयाग के कुम्भ के स्नान-दानादि से प्राप्त हो जाते हैं-
अश्वमेघ सहस्राणि वाजपेय शतानि च।
लक्षं प्रदक्षिणा भूमेः कुम्भस्नानेन तत्फलम् ।।
श्रीगङ्गाष्टकम् (स्वामी शंकराचार्य द्वारा रचित)
भगवति तव तीरे नीरमात्राशनोऽहं
विगतविषयतृष्णः कृष्णमाराधयामि ।
सकलकलुषभङ्गे स्वर्गसोपानसङ्गे
तरलतरतरङ्गे देवि गङ्गे प्रसीद ॥ १ ॥
भगवति भवलीलामौलिमाले तवाम्भः
कणमणुपरिमाणं प्राणिनो ये स्पृशन्ति ।
अमरनगरनारीचामरग्राहिणीनां
विगतकलिकलङ्कातङ्कमङ्के लुठन्ति ॥ २ ॥
ब्रह्माण्डं खण्डयन्ती हरशिरसि जटावल्लिमुल्लासयन्ती
स्वर्लोकादापतन्ती कनकगिरिगुहागण्डशैलात्स्रवलन्ती ।
क्षोणीपृष्ठे लुठन्ती दुरितचयचमूर्निर्भरं भर्त्सयन्ती पाथोधिं
पूरयन्ती सुरनगरसरित्पावनी नः पुनातु ॥ ३ ॥
मज्जन्मातङ्गकुम्भच्युतमदमदिरामोदमत्तालिजालं
स्नानैः सिद्धाङ्गनानां कुचयुगविगलत्कुङ्कुमासङ्गपिङ्गम् ।
सायंप्रातर्मुनीनां कुशकुसुमचयैश्छन्नतीरस्थनीरं
पायान्नो गाङ्गमम्भः करिकलभकराक्रान्तरंहस्तरङ्गम् ॥ ४ ॥
आदावादिपितामहस्य नियमव्यापारपात्रे जलं पश्चात्पन्नगशायिनो भगवतः पादोदकं पावनम् ।
भूयः शम्भुजटाविभूषणमणिर्जह्नोर्महर्षेरियं
कन्या कल्मषनाशिनी भगवती भागीरथी दृश्यते ॥ ५ ॥
शैलेन्द्रादवतारिणी निजजले मज्जज्जनोत्तारिणी
पारावारविहारिणी भवभयश्रेणीसमुत्सारिणी ।
शेषाहेरनुकारिणी हरशिरोवल्लीदलाकारिणी काशीप्रान्तविहारिणी विजयते गङ्गा मनोहारिणी ॥ ६ ॥
कुतो वीचिर्वीचिस्तव यदि गता लोचनपथं
त्वमापीता पीताम्बरपुरनिवासं वितरसि ।
त्वदुत्सङ्गे गङ्गे पतति यदि कायस्तनुभृतां
तदा मातः शातक्रतवपदलाभोऽप्यतिलघुः ॥ ७ ॥
गङ्गे त्रैलोक्यसारे सकलसुरवधूधौतविस्तीर्णतोये
पूर्णब्रह्मस्वरूपे हरिचरणरजोहारिणी स्वर्गमार्गे ।
प्रायश्चित्तं यदि स्यात्तव जलकणिका ब्रह्महत्यादिपापे
कस्त्वां स्तोतुं समर्थस्त्रिजगदघहरे देवि गङ्गे प्रसीद ॥ ८ ॥
मातर्जाह्नवि शम्भुसङ्गवलिते मौलौ निधायाञ्जलिं
त्वत्तीरे वपुषोऽवसानसमये नारायणाङ्घ्रिद्वयम् ।
सानन्दं स्मरतो भविष्यति मम प्राणप्रयाणोत्सवे
भूयाद्भक्तिरविच्युताहरिहराद्वैतात्मिका शाश्वती ॥ ९ ॥
गङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत्प्रयतो नरः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥ १०॥
श्री गङ्गा स्तुति
यत् - संस्मृतिः सपदि कृन्तति दुष्कृतौघं, पापावलीं जयति योजन-लक्षतोऽपि । यन्नाम नाम जगदुच्चरितं पुनाति, दिष्टया हि सा पति दृशोर्भविताऽद्य गङ्गा ॥ ३ ।।
आलोकोत्कण्ठितेन प्रमुदित-मनसा वर्म यस्याः प्रयातं, सद् यस्मिन् कृत्यमेतामथ प्रथम-कृती जज्ञिवान् स्वर्ग-सिन्धुम् । स्नानं सन्ध्या निवापः सुर-यजनमपि श्राद्ध-विप्राशनाद्यं, सर्वं सम्पूर्णमेतद् भवति भगवतः प्रीतिदं नात्र चित्रम् ॥ ४ ॥
द्रवी-भूतं परं ब्रह्म, परमानन्द-दायिनि। अर्घ्य गृहाण मे गङ्गे ! पापं हर नमोऽस्तु ते ॥५।।
श्रीगङ्गा-स्तुति-जिनकी स्मृति पाप-राशि का तत्काल नाश कर देती है, जो लाख योजन दूर से भी पापों के समूह को परास्त करती हैं, जिनका नाम उच्चारण किए जाने पर सम्पूर्ण जगत् को पवित्र कर देता है, वे गङ्गा जी आज सौभाग्य-वश मेरे दृष्टि पथ में आएँगी।
मनुष्य दर्शन के लिए उत्कण्ठित तथा प्रसन्न-चित्त होकर जिनके पथ का अनुसरण करता है, जिनके तट पर समस्त शास्त्र-विहित कर्म उत्तमता पूर्वक सम्पन्न होते हैं, उन गङ्गा जी को आदि-सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने पहले स्वर्ग-गङ्गा के रूप में उत्पन्न किया था। उनके तट पर किया हुआ स्नान, सन्ध्या, जप, तप, ध्यान, तर्पण, देव-पूजा, श्राद्ध और ब्राह्मण-भोजन दान आदि सब कु परिपूर्ण एवं भगवान् को प्रसन्नता प्रदान करने वाला होता है-इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
परमानन्द प्रदान करने वाली हे गङ्गा जी! आप जल रूप में अवतीर्ण साक्षात् पर-ब्रह्म हैं। आपको नमस्कार है। आप मेरा दिया हुआ 'अर्घ्य' ग्रहण कीजिए और मेरे पाप हर लीजिए।
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