कुंभ का प्रचार खर्च दो पैसे का रहस्य

कुंभ का प्रचार खर्च दो पैसे का रहस्य

मालवीय जी के दो पैसे के रहस्य ने वायसराय को कर दिया हैरान।

प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) के क्षेत्रीय अभिलेखागार में रखे एक दस्तावेज से यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आता है। इन दस्तावेजों से यह साफ पता चलता है कि कुंभ मेला कभी अंग्रेजों के लिए सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक राजस्व का स्रोत भी था। 
इस लेख में हम आपको प्रयागराज महाकुंभ के एक ओर दिलचस्प किस्सा के बारे में जानकारी दें रहे हैं। यह किस्सा 1942 के प्रयागराज महाकुंभ से जुड़ा है। 

इसी मेले के दौरान भारत के तत्कालीन वायसराय जनरल लॉर्ड लिनलिथगो, पंडित मदनमोहन मालवीय के साथ कुंभ मेले का अवलोकन करने जा पहुंचे। जब वायसराय ने देखा कि लाखों लोग अलग-अलग वेशभूषाओं में त्रिवेणी स्नान और भजन-पूजन कर रहे हैं तो उसको यह दृश्य हैरान और परेशान कर गया। 

इतने बड़े आयोजन को देखकर वायसराय के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई और उन्होंने मालवीय जी से पूछा, " इतनी भीड़ ! इसके प्रचार पर कितना खर्च होता होगा ?"

इस पर मालवीय जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "मात्र दो पैसे।" 

वायसराय मालवीय जी के इस जवाब से हैरान हो गए और चौंकते हुए पूछा, "दो पैसे में यह कैसे संभव है?"

 मालवीय जी ने शांति से अपनी जेब से पंचांग निकाला और कहा, "इस पंचांग के माध्यम से लोग जान जाते हैं कि कौन-सा पर्व कब है, और अपनी श्रद्धा से प्रेरित होकर वे बिना किसी प्रचार के अपनी तीर्थयात्रा पर निकल पड़ते हैं।"

यह जवाब सुनकर वायसराय न केवल हैरान हुए, बल्कि उन्होंने कुंभ मेला और उसके श्रद्धालुओं के प्रति अपनी निष्ठा और सम्मान को स्वीकार किया। 

मालवीय जी ने शांतिपूर्वक दिए उत्तर से कुंभ के धार्मिक महत्व को दर्शाने के साथ- साथ अंग्रेज वायसराय को यह भी समझाने में सफल रहे कि कुंभ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय समाज की प्राचीन व्यवस्था और आस्था का अद्वितीय उदाहरण है। जो अपने अंदर ज्योतिषीय और वैज्ञानिक विश्वसनीयता को छिपाए हुए हैं।


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