01. पञ्चांग परिचय (तिथि, वार, नक्षत्र, करण, योग)
पञ्चांग परिचय (तिथि, वार, नक्षत्र, करण, योग)
।। श्री गणेशाय नमः ।।
"तिथि वारं च नक्षत्रं योगं करणमेव च ।
पञ्चान्गस्य फलं श्रुत्वा गंगा स्नानं फलं लभेत् ।।"
"यथा शिखा मयूराणाम नागानां मणयो यथा ।
तद्व्वेदांग शास्त्राणाम ज्योतिषां मूर्ध्निस्थितां ।।"
तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण से पञ्चांग बनता है ।
तिथि :-
शुक्ल पक्ष:- | कृष्ण पक्ष:- |
प्रतिपदा-१ द्वितीया-२ तृतीया-३ चतुर्थी-४ पञ्चमी-५ षष्ठी-६ सप्तमी-७ अष्टमी-८ नवमी-९ दशमी-१० एकादशी-११ द्वादशी-१२ त्रयोदशी-१३ चतुर्दशी-१४ पूर्णिमा-१५ | प्रतिपदा-१६ द्वितीया-१७ तृतीया-१८ चतुर्थी-१९ पञ्चमी-२० षष्ठी-२१ सप्तमी-२२ अष्टमी-२३ नवमी-२४ दशमी-२५ एकादशी-२६ द्वादशी-२७ त्रयोदशी-२८ चतुर्दशी-२९ अमावस्या-३० |
वार :-
रविवार-१ सोमवार-२ मंगलवार-३ बुधवार-४ वीरवार-५ शुक्रवार-६ शनिवार-७ | “जिस दिन की प्रथम होरा का जो ग्रह स्वामी होता है उस दिन का वही वार होता है। शनि, गुरु, मंगल, रवि, शुक्र, बुध, चन्द्रमा । आकाश मंडल में इन ग्रहों की कक्षा एक दुसरे से नीचे मानी गयी है । एक दिन में २४ होराएँ होती हैं । एक होरा एक घंटे की होती है । इसको अहोरात्र भी कहते हैं । एक एक करके २४ होरा बीत जाने पर २५वीं होरा अगले दिन का वार होती है । क्रम से प्रत्येक ४थी होरा अगले दिन का वार होती है ।” |
नक्षत्र :-
अश्विनी-१ भरणी-२ कृत्तिका-३ रोहिणी-४ मृगशिरा-५ आर्द्रा-६ पुनर्वसु-७ पुष्य-८ आश्लेषा-९ | मघा-१० पूर्वाफाल्गुनी-११ उत्तराफाल्गुनी-१२ हस्त-१३ चित्रा-१४ स्वाती-१५ विशाखा-१६ अनुराधा-१७ ज्येष्ठा-१८ | मूल-१९ पूर्वाषाढ़ा-२० उत्तराषाढ़ा-२१ श्रवण-२२ धनिष्ठा-२३ शतभिखा-२४ पूर्वाभाद्रपद-२५ उत्तराभाद्रपद-२६ रेवती-२७ |
योग :-
विष्कुम्भ-१ प्रीती-२ आयुष्मान-३ सोभाग्य-४ शोभन-५ अतिगण्ड-६ सुकर्मा-७ धृति-८ शूल-९ | गंड-१० वृद्धि-११ ध्रुव-१२ व्याघात-१३ हर्षण-१४ वैर-१५ सिद्धि-१६ व्यतिपात-१७ वरीयान-१८ | परिघ-१९ शिव-२० सिद्ध-२१ साध्य-२२ शुभ-२३ शुक्ल-२४ ब्रह्मा-२५ इंद्र-२६ वैधृति-२७ |
करण :-
तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं । कोन सी तिथि को कोन सा करण कोन से आधे भाग में होगा यह नीचे लिखा है :-
तिथि | शुक्ल पक्ष १/२ | १/२ | तिथि | कृष्ण पक्ष १/२ | १/२ |
प्रतिपदा-१ द्वितीया-२ तृतीया-३ चतुर्थी-४ पञ्चमी-५ षष्ठी-६ सप्तमी-७ अष्टमी-८ नवमी-९ दशमी-१० एकादशी-११ द्वादशी-१२ त्रयोदशी-१३ चतुर्दशी-१४ पूर्णिमा-१५ | किंस्तुघ्न बालव तैतिल वणिज बव कौलव गरज विष्ट बालव तैतिल वणिज बव कौलव गरज विष्ट | बव कौलव गरज विष्ट बालव तैतिल वणिज बव कौलव गरज विष्ट बालव तैतिल वणिज बव | प्रतिपदा-१६ द्वितीया-१७ तृतीया-१८ चतुर्थी-१९ पञ्चमी-२० षष्ठी-२१ सप्तमी-२२ अष्टमी-२३ नवमी-२४ दशमी-२५ एकादशी-२६ द्वादशी-२७ त्रयोदशी-२८ चतुर्दशी-२९ अमावस्या-३० | बालव तैतिल वणिज बव कौलव गरज विष्ट बालव तैतिल वणिज बव कौलव गरज विष्ट चतुष्पाद | कौलव गरज विष्ट बालव तैतिल वणिज बव कौलव गरज विष्ट बालव तैतिल वणिज शकुन नाग |
"बवाह्वयं बालव कोलवारण्ये तत्तो भवे तैतिल नाम ध्येयं ।
गराभिधानं वणिजं च विष्टिरिव्याहुरार्याः करणानि सप्त ।।
अन्ते कृष्ण चतुर्दश्यां शकुनिर्दश भागयोः ।।
ज्ञेयं चतुष्पदं नागं किंस्तुघ्नं प्रतिपद्यते ।।"
बव, बालव, कौलव, तैतिल, गरज, वणिज, विष्ट आदि ७ करणों की बार बार पुनरावृत्ति होती है । और शेष ४ शकुन, चतुष्पाद, नाग, किंस्तुघ्न एक माह में एक बार ही आते हैं । विष्ट करण को ही भद्रा कहा जाता है ।
कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के उत्तरार्द्ध में शकुनि, अमावस्या के पूर्वार्द्ध में चतुष्पद, अमावस्या के उत्तरार्द्ध में नाग, शुक्ल प्रतिपदा के पूर्वार्द्ध में किस्तुघ्न नाम के करण होते
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